प्रचलित नाम- सम्मालु ( सिंदुवार )
प्रयोज्य अंग- पंचांग , पत्र , फल तथा बीज ।
स्वरूप -यह वनौषधि एक झाड़ीदार लधु वृक्ष है , जो श्वेताभ रोमावरण से आच्छादित होता है । पत्ते संयुकत , पत्रक ३-५ , पत्रक अखण्ड या गोलदन्तुर , लम्बाग्र छोटे - बड़े होते हैं । अग्र पत्रक लम्बा तथा नीचे के पत्रक छोटे एवं बिना वृन्त के होते हैं । ऊपरी सतह हरी जबकि नीचली सतह श्वेताभवर्ण की होती है । पुष्प सफेद या नीले रंग के मंजरियों में होते हैं । फल गोल पकने पर काले हो जाते हैं ।
स्वाद - तिक्त ।
रासायनिक संगठन इसमें उड़नशील तेल , क्षारभ ( निर्गुण्डीन तथा हाइड्रोकोटिलोन ) विटामिन - सी , केरोटिन , फलेवोन , टैनिक अम्ल , हाइड्रोक्सीबेन्जोइक अम्ल राल तथा मैलिक अम्ल पाये जाते हैं ।
गुण - सुगंधित , बल्य , वेदनाहर , कफ निःसारक , कृमिनाशक , शोथघ्र , दीपन , वातहर , रसायन , मूत्रल ।
उपयोग - जीर्ण आमवात , कास , ज्वर , शूल , कुपचन , आध्मान , कुष्ठरोग में , व्रण , शिर : भार , श्रवण भेद , प्लीहावृद्धि में इसके बीज शोथ गुण वाले हैं । फेफड़ों के शोथ , उदावरण शोथ , संधिशोथ , तीव्र आमवातिक संधि शोथ - इसके बीज के चूर्ण के सेवन से लाभ , इसके पत्तों को पीसकर गरम कर शोथ पर प्रतिदिन ३ ४ बार बांधने से लाभ होता है । इसके साथ करंज , नीम तथा धतूरे के पत्तों का भी उपयोग लाभकारी । कफ ज्वर एवं फुफ्फुसावरणीय शोथ में इसके पत्रों का स्वरस या क्वाथ , छोटी पिप्पली के साथ पिलाने से लाभ तथा पत्रों का सेक किया जाता है । शीत ज्वर एवं विषम ज्वर में इसके पत्रों का चूर्ण या पंचांग स्वरस के सेवन से लाभ होता है । मूल का क्वाथ गठियारोग में लाभकारी है । गृध्रसी - सायेटिका
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