प्रचलित नाम- सोंठ / अदरख
प्रयोज्य अंग : - भूमिगत कांड
स्वरूप -एक लघु क्षुप है जिसका भूमिजन्य कांड भूमि के समान्तर मांसल होता है । जिसको अदरख कहते हैं । पुष्प लम्बी मंजरी पर बैंगनी रंग के होते हैं ।
स्वाद - कटु- तीक्ष्ण ।
रासायनिक संगठन- इसके भूमिगत कांड में प्रोटीन्स , रेशे , स्टार्च उत्पत्त तेल , राल , कार्बोदित , ग्लूकोज , फ्रुक्टोज , सुक्रोज , रेफिनिस , इन्यूलिन , ग्लोब्युलिन , ग्लूटामिन , थ्रीयोनिन , मुक्त एमिनोअम्ल , जिन्जीबेरॉल , जिन्जीबेरीन , ग्लूटामिक अम्ल एस्पार्टीक अम्ल पाये जाते हैं । गुण - शूलहर , रक्तशोधन , वातहर , कफ नि : सारक , रुचिकर , पाचन , उत्तेजक , सुगंधित उपयोग - गृध्रसी , संधि विकारों , कटिशूल , आमवात , स्लीप - डीस्क में , वातरोग , जीर्ण संधि शोथ , स्नायु विकारों में , श्वासरोग , खाँसी ,
श्वसनीशोथ , जीवन की वय मर्यादा में एवं रोग प्रति कारक शक्ति में वृद्धि करने हेतु , इसका प्रयोग लाभकारी । त्रिकूटि- ( सोंठ , काली मिरची एवं पिप्पली का मिश्रण ) इसका प्रयोग अनेक रोगों में किया जाता है । सोंठ का चूर्ण : पाचन क्रिया ठीक होकर उदरगत वायु एवं उदरशूल लाभ प्रदान करता है । सोंठ के फांट से संधिवात में लाभ होता है । इसके अतिरिक्त प्रतिश्याय , गले के रोग , स्वरभंग में लाभकारी । शिरःशूल एवं वातनाड़ी शूल में सोंठ के चूर्ण का लेप ( गरम जल से ) लाभकारी । वेदना के साथ मूत्र मार्ग से रक्तस्राव होता हो , तो ३०० मि . ली . दूध में आधा तोला शुण्ठी चूर्ण , मिश्री मिलाकर , उबालकर पिलाने से लाभ होता है । अर्श में शुण्ठी तथा चित्रक मूल का चूर्ण समभाग लेकर पकाये हुए इक्षुरस ( गन्ने ) के साथ सेवन से लाभ होता है । अतिसार में खस ( उशीर ) एवं अदरख से पकाये हुए जल के सेवन से लाभ होता है । उदर रोग में अदरख स्वरस तथा दूध समान भाग मिलाकर पीने से लाभ होता है । आम पाचन के लिये सोंठ का चूर्ण आधा तोला गरम जल के साथ सेवन करने से लाभ । कर्णशूल में अदरख स्वरस किंचित् तेल , मधु तथा सैन्धव लवण इन सबको मिलाकर किंचित् गरम करके कान में एक बूंद टपकाने से लाभ होता है । गुल्म में निशोथ तथा शुण्ठी का चूर्ण जल के साथ सेवन से लाभ होता है । सन्निपात ज्वर में अदरख के स्वरस में सैंधव और त्रिकटु ( सोंठ , काली मिर्च , पिप्पली ) का चूर्ण मिलाकर गण्डूष्य करना चाहिए , बार - बार इस प्रकार भर कर और फिर थूक देने से गले के पिछले भाग में , दोनों पार्श्व में , कण्ठ में जमा हुआ शुष्क कफ बाहर निकलने लगता है । रोगी को अपना शरीर हल्का मालूम पड़ेगा । संधि शूल , ज्वर , मूर्छा , निद्रा , कास आदि शांत हो जाते हैं । जठराग्नि प्रदीप्त करने के लिये भोजन से पूर्व नियमित सैंधव मिलाकर अदरख का सलाद खिलाना चाहिये , इसके सेवन से जिह्वा एवं कंठ शुद्ध होकर जठराग्नि प्रदीप्त होती है । अजीर्ण में अजीर्ण , अर्श और दस्त खूब बंधा हुआ कठिन आता हो , तो गुड़ और सोंठ चूर्ण समभाग मिलाकर खिलाने से लाभ होता है । आमवात में शुण्ठी एवं गोखरू का क्वाथ पीने से आमवात , कटिशूल की पीड़ा नष्ट हो जाती है । हृद्रोग में सोंठ का गरम - गरम क्वाथ पिलाने से कास , श्वास व हृदय रोग नाश होता है । विषम ज्वर में महाबला के मूल और शुण्ठी इन दोनों का क्वाथ पीने से विषम ज्वर नाश होता है । कितना ही कंपन अथवा ठंडक के साथ ज्वर आता हो दो तीन दिन के प्रयोग से विषम ज्वर ठीक हो जाता है । अदरख का सूप- एक तोला अदरख के टुकड़ों को २०० मि . ली . जल में डालकर भलीप्रकार उबाल लें , जब केवल ५० मि . ली . जल बाकी रहे , तब अग्नि से उतार कर ठण्डा कर उसमें नीबू का रस तथा सैन्धव मिलाकर पिलाने से अरुचि तथा अजीर्णता नष्ट होकर भूख बढ़ती है । इसके साथ - साथ मल विकार के दोष नष्ट होते हैं । इस जल ( सूप ) में गाय का घी एक चम्मच मिलाकर पिलाने से अंगघात में बहुत ही लाभ होता है । मात्रा आर्द्रक स्वरस- एक से पाँच तोला । शुण्ठी चूर्ण एक चौथाई से एक तोला ।
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