किकर(बबूल) का प्रयोग महिलाओं और आदमियो के लिए। बबूल के फायदे और नुकसान

 प्रचलित नाम- कीकर ( बबूल )

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 प्रयोज्य अंग - कांड , पत्र , फल , कांड की छाल एवं गोंद ।

 स्वरूप- मध्यम कद का कंटकीय वृक्ष , मुख्य तना छोटे कद का , पत्र संयुक्त , चमकीले पीले पुष्प गोलमुंडक में । 

स्वाद - कटु कषाय । 

रासायनिक संगठन - इसकी छाल में बीटा ऐमीरीन , गैलीक अम्ल , टैनिन , कैटेचीन , क्वेरसेटिन , ल्युकोसायनीडीन । फल में - गैलिक अम्ल , कैटेचीन , क्लोरोजैनिक अम्ल । गोंद में- गैलेक्टोज़ , एरेबीक अम्ल , कैल्सियम एवं मैग्नेशियम के लवण , इसके बीज में - ऐस्कोरबीक अम्ल , नियासिन , थायमीन एवं एमिनो अम्ल पाये जाते हैं ।

 गुण -ग्राही , कृमिघ्न , विषहर , शोथहर , कुष्ठ ।

 उपयोग- चर्मरोग में , रक्त प्रवाहिका , रक्तस्रावी रोग में , प्रमेह , श्वेत प्रदर में , अस्थिभग्न ,रक्तस्तंभक , व्रणरोपण , शुष्ककास । गोंद पौष्टिक , मुख के छाले , गले के सूखने में इसको चूसने से लाभ , मूत्रकृच्छ्र , अतिसार में तथा मधुमेह में इसका सेवन लाभकारी । छाल का क्वाथ - मुख रोग , दाँत हिलना तथा गले की सूजन में लाभ । अतिसार में इसकी पत्तियों का स्वरस छाश में मिलाकर पिलाने से हर प्रकार के अतिसार में लाभ होता है । इसकी दो फलियाँ खाकर ऊपर से छाछ पीनी चाहिए । प्रवाहिका में - इसकी कोमल पत्तियों के एक चम्मच रस में थोड़ा - सा हरड़ का चूर्ण मिलाकर सेवन करना चाहिए तथा ऊपर से छाछ पिलानी चाहिए । अत्यार्त्तव में- इसकी छाल का काढ़ा बनाकर पिलाने से मासिक में अधिक रक्त बहना बंद होता है । दाह एवं तृषा में इसकी छाल के काढ़े में मिश्री मिलाकर पिलाना चाहिए । अरुचि में इसकी कोमल फलियों के आचार में सैन्धव लवण मिलाकर खिलाने से रुचि बढ़ती है तथा जठराग्नि प्रदीप्त होती है । मुख रोग - दंत रोग - इसकी छाल को जल में उबालकर इस जल से कुल्ला करना चाहिए । या इसका दातून या गोंद मुँह में चबाने से उपर्युक्त रोगों में लाभ होता है । ट्रॉन्सिल में छाल के काढ़े से या पत्रों के रस से कुल्ला करना चाहिए । कोमल टहनी या पत्रों के रस में हल्दी मिलाकर तीन या चार दिन तक  पिलाना चाहिए । रक्तस्राव में- शरीर के किसी भी अंग से रक्तस्राव होता हो , तो उस पर पत्रों का रस ( पीसकर ) लगाना चाहिए या सूखे पत्रों या सूखी छाल का चूर्ण उस पर छिड़क देना चाहिए । पित्तजकास में- गरमी की खाँसी में इसके पत्रों को चबाकर इस रस को कुंठ में उतारना चाहिए तथा इसकी गोंद को चूसना चाहिए । यह प्रयोग स्वर भेद के लिये भी उपयोगी है । अस्थिभग्न में इसके बीजों का चूर्ण मधु में मिलाकर चटाने से बहुत ही लाभ होता है । जलोदर में - इसकी छाल के क्वाथ को घन स्वरूप बनाकर इसकी आधे ग्राथ की गोली बनाकर एक - एक गोली प्रातः , सायं , रात्रि समय मधु के साथ या छाछ के साथ सेवन करानी चाहिए । कान्तिवान संतान के लिये सूखे पत्रों का चूर्ण दो से चार ग्राम गर्भवती  महिला को प्रतिदिन प्रातः सेवन कराने से  सुंदर बालक का जन्म होगा । धातु पुष्टि में अति मैथुन के कारण या गरमी के कारण वीर्य पतला हुआ हो या प्रमाण कम हुआ हो , तो इसके गोंद को घी में तल कर दुगुनी शर्करा मिलाकर सेवन कराना चाहिए । मात्रा- छाल का क्वाथ - ५०-१०० मि.ली. । - फल का चूर्ण - ३-६ ग्राम । गोंद - ३-६ ग्राम ।



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